एक समय था, जब बाढ़ड़ा और आसपास के इलाकों में किसानों के खेतों में यह काकड़ी खूब देखने को मिलती थी। गर्मियों के दिनों में खेतों में उगी ताजी काकड़ी खाने का अपना ही मजा हुआ करता था।
खेत से काकड़ी तोड़कर खाना, उसका देसी स्वाद और बचपन की वो यादें… आज भी बहुत से लोगों के दिलों में ताजा हैं।
लेकिन वक्त के साथ बहुत कुछ बदल गया। कभी खेतों में आसानी से मिलने वाली यह देसी काकड़ी आज कई जगहों पर देखने को भी नहीं मिलती। अब तो इसकी यादें और तस्वीरें ही पुराने समय की कहानी सुनाती हैं।
वैसे काकड़ी खाना किसे पसंद नहीं होगा? गर्मियों में ठंडी-ठंडी देसी काकड़ी मिल जाए, तो स्वाद ही कुछ और होता है।
आप बताइए, क्या आपके गांव में भी पहले ऐसी काकड़ी होती थी? और क्या आज भी आपके खेतों में यह उगती है? कमेंट में अपनी पुरानी यादें जरूर साझा करें।







